चलती हुई ज़िन्दगी का ठहराव

आज फिर भर आई हैं यह आँखें
क्या करूँ , कमबख्त मानती ही नहीं
कितना समझाया कि मुझे इससे क्या
मेरा इससे के क्या वास्ता
पर फिर भी बार बार भर आती हैं …
तमाम शोरगुल के बीच निकलकर
आती हुई सिसकियाँ …
अनजाने में ही भेद देती हैं अंतर्मन को ..
हवा में घुली वो बेजुबान सिसकियाँ
मेरी बेबसी को और बड़ा देती हैं
और में इस बेबसी के बचने के लिए
स्वयं को इन सब के दूर कर लेता हूँ …
…लेकिन वो ज़मीं जिस पर में रोज़ चलता हूँ
वो पानी जी रोज़ पीता हूँ
वो हवा जिसमे रोज़ सांस लेता हूँ
रोज़ मुझे मेरे इसका हिस्सा होने का एहसास दिलाती है
पर में स्वयं को इससे दूर कर लेता हूँ
समस्त एहसास और जिम्मेदारियों के दूर …
…शायद एक और ऐसी रात का इंतज़ार …
ताकि में अपनी निष्क्रियता कि जंजीरों को हटा पाऊँ …
…पर तब तक हर साल यह आँखें
यूँ ही तारीखों कि तरह भारती रहेंगी
और जाती हुई हवाओं के साथ सूख भी जाएँगी .
कहते हैं ज़िन्दगी ऐसी ही चलती है
पर क्या वाकई ऐसा होता है..
बस एक बार ३ दिसंबर १९८४ से रूबरू तो हो
… तो जानोगे कि चलती हुई ज़िन्दगी का ठहराव क्या होता है …

गीतांजलि
भोपाल

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